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Not my cup of Tea!

‘Not My Cup Of Tea’ is based on a small real-life incident that had my wife and me in splits. 
 It is a humorous short story of an Indian couple, Malini and Sanjay, who love each other a lot but in the process of going through the daily grind and raising their two demanding kids, they feel that their relationship is getting a little strained as they aren’t able to devote much time towards each other. The story makes an interesting read especially along with a piping hot cup of Masala Tea (and a little betting money) by your side!
 I dedicate this piece to my lovely wife, Shalini, and to all our years of togetherness!

It was a lazy February afternoon. Malini was recuperating from a viral infection and lay in bed enjoying her nap. The mild sunlight snuck inside their bedroom from the gaps in the loosely drawn panels of curtains and spread across her face. It slowly cajoled her out of her slumber. She blinked her eyes and glanced at the clock on the desk. The desk-clock, in total agreement with her metabolic clock, signaled Teatime!

Malini still had a slight body-ache from her viral infection. How she wished, she owned a genie-in-a-lamp who would conjure up a piping hot cup of tea at her bedside.

She looked at the second best option – Sanjay who was seated at his desk. He was busy pecking at the keyboard of his laptop. He too had recently recovered from the viral infection… and so had their two kids. What a loving family! They always fell ill as a team. Sanjay was working on his new story, and a few hours immersed in his intricate plots always fanned his craving for tea.

“Sanjay, What’s the time?” Malini knew she could not just “order Tea” from her husband, so she used one of her time-tested icebreakers.

“I guess, its time for a cup of tea.” Sanjay helped her cut the chase short.

“Will you prepare it while I tidy up the room?” she tried her luck as she stood up.

“I’m too fatigued mentally and physically, so if you could do the honors…” Sanjay raised his hands.

“Me too, but I’ll go prepare it.” She said as she trudged dutifully towards the kitchen.

“You are such a darling.” Sanjay showed his appreciation. “But don’t you think we should’ve had our tea half an hour ago.”  He continued with a slightly raised voice, enough to be audible in the kitchen. “’Cuz the moment you have your first sip, either the little one will wake up from his nap and throw a tantrum or the older one will start pestering you with his demands.” Sanjay professed. “In fact I can bet that today it will be the older one’s turn to rob us of our tea-time… because it was the little one who didn’t let us have our tea in peace yesterday.”

“You are always after my sons!” Malini defended her darlings as she brewed the beverage.

“You don’t believe me? I can see the future.”  Sanjay was sure.

“We’ll see! Malini brought in the two cups in a tray along with some cookies.

“Alright, settle down.” Sanjay pointed to a chair as he changed the channel to Malini’s favorite TV show. “Enjoy your first sip… because that’s the only one you’ll enjoy before the older one yells ‘Mammaaaa!’ ”

“I know my kids.” Malini was still the protective mother. “They will let me have my cup in peace today.”

“My bet is still on!” Sanjay, the clairvoyant seemed confident. “Only one sip before you hear from the older one!”

“Okay, here’s my first sip.” Malini slurped gingerly.

“And here’s the second sip.” Malini smiled triumphantly.

“My darlings are the best” She dipped a cookie in the Tea as her cell phone sounded.

“Oh, Its Papa, I have to take his call.” A portion of the tea-soaked cookie fell inside her cup as she put it on the table.

“There goes our teatime!” It was Sanjay’s turn to smile now. “I won the bet. Thanks to the older one – I mean the oldest one 😁.”

In corporate terms, we all know that the middle management has to cater to both the subordinates as well as the top management.

Ajay Mago

एक से क्या होगा!

“अरे क्यों रुला रही है नेहा को बहू, एक चॉक्लेट ही तो मांग रही है, खाने दे बेचारी को।” दादी को अपने पाले में देख नेहा की आँखों में चमक आ गयी।
“नहीं मम्मी-जी! आपको पता तो है इसके दांत में कीड़ा लग रहा है, लॉकडाउन में डेंटिस्ट भी बंद हैं।” साधना ने झल्ला कर कहा।
“अरे एक चॉकलेट से क्या बिगड़ेगा, बाद में मंजन कर लेगी।” नेहा की दादी डटी रही।
हार मान साधना कमरे से निकल बाहर हॉल में चली गयी। नेहा कूद कर दादी की गोद में चढ़ गयी और अलमारी के सबसे ऊपर वाले शेल्फ की ओर इशारा करके चॉकलेट का ठिकाना बताया।

हल्की-हल्की बूंदा बांदी होने लगी थी। शाम की चाय का समय हुआ तो मनोज ने साथ में पकोड़ों की फरमाइश भी करदी। सब डाइनिंग टेबल पर अड्डा जमाये ताश खेल रहे थे। साधना चाय और पकोड़े लायी और सबको सर्व करने लगी।

जब पापाजी की प्लेट में पकोड़ा डाला तो मम्मी-जी बोलीं “बहू, ये नहीं खाएंगे।” पापाजी का मुँह उतर गया, मानो ताश की बाज़ी हार गए हों।
“मम्मी-जी, एक तो खाने दो पापा-जी को – एक से क्या होगा।” मनोज और साधना ने एक स्वर में कहा।
“ना ना, बिलकुल नहीं! तुम्हे पता तो है, डॉक्टर ने इन्हें तला हुआ बिलकुल मन किया है।” मम्मी-जी अटल थीं।

चाय की चुस्कियां लेते-लेते जाने मम्मी-जी को क्या ख़याल आया के उठकर नेहा के कमरे में गयीं और शेल्फ से बची हुई चॉकलेट्स उठाकर स्टोर-रूम में छिपा दीं।

© अजेय मागो

अपराधी कौन? (लघुकथा)

इंस्पेक्टर भूषन ने लाश को पोस्ट मोर्टेम के लिए भेजने का आदेश दिया। एक ही महीने में फिल्म इंडस्ट्री की यह तीसरी ख़ुदकुशी थी।
खबरों के बाज़ार का तवा ठंडा होने का नाम ही नहीं ले रहा था। पहले एक अभिनेत्री की मैनेजर, फिर एक मशहूर एक्टर और आज यह प्रोडूसर।
जाने बॉलीवुड को किस की नज़र लग गयी थी। या फिर ये कोरोना महामारी का एक साइड इफ़ेक्ट था… क्या कोरोना के चलते काम बंद होने की वजह से ये डिप्रेशन की गिरफ्त में आये और ये कदम उठाया? टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर इसी विषय पर चर्चाएं हो रही थी। सुसाइड नोट के अभाव में खूब अटकलें, तर्क, आरोप, प्रत्यारोप सुनने को मिल रहे थे।

इस बार लाश की जेब से एक सुसाइड नोट मिला था, जिसे इंस्पेक्टर भूषण ने नींद की गोलियों की शीशी, कॉफ़ी के कप और अन्य सबूतों के साथ एविडेंस बॉक्स में डाल दिया। देखकर फोरेंसिक टीम के इंचार्ज मधुकर जी उनकी ओर आये।
“लगता है यह केस पिछले दोनों केसेस से आसान रहेगा – सुसाइड नोट में क्या लिखा है ?” मधुकर ने इंस्पेक्टर भूषण से पुछा।
“वही जिसका मुझे शक था। ” इंस्पेक्टर भूषण ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।
“प्रोडूसर साहब खुद पर हो रहे मीडिया ट्रायल और भाई-भतीजावाद के इलज़ाम को सह नहीं पाए। पब्लिक का उस एक्टर की ख़ुदकुशी में उनको दोषी ठहराना और उनके विरुद्ध बहिष्कार की मुहीम छेड़ना काफी था उनको विचलित करने और ये कदम उठाने पर मजबूर करने के लिए”।

इंस्पेक्टर भूषण सोच रहे थे की जिस चीज़ का इलज़ाम लोग इस प्रोडूसर पर लगा रहे थे, वही इसके साथ कर गए !!

©अजेय मागो ‘हाज़िर’

चौदह फरवरी (Not a Love Story)

“पापा, आज चौदह फरवरी है – मम्मा के लिए गुलाब के फूल ले लो।” लाल बत्ती पर रुकी अपनी कार के बाहर फूल बेचने वाली को देख नन्हे आर्यन ने अमित को याद दिलाया।

अमित ने मुस्कुरा कर बेटे को देखा और शीशा नीचे करते हुए लड़की से पुछा “इसके कितने हुए?”
“सौ रुपये, साहब” लड़की ने आशावादी मुस्कान सहित गुच्छा अमित की और बढ़ाते हुए कहा।
“बाकी रख ले।” अमित ने एक हाथ फूल लिए और दूजे से पांच-सौ का नोट लड़की को थमा कर शीशा ऊपर चढ़ा लिया।

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लड़की के चेहरे पर असीम प्रसन्नता और आर्यन के चेहरे पर अचरज के भाव उमड़ आये।
“यह क्या था पापा! इस हफ़्ते मेरी पॉकेट-मनी देने में भी इतनी दिलेरी दिखाओगे क्या?” आर्यन ने गर्म तवे पर अपनी रोटी सेकने की चेश्टा की।

जवाब में अमित चौदह साल पीछे चला गया ….

“बाबूजी, गुलाब ले लो, सिर्फ दस रुपये की जोड़ी है।” लाल बत्ती पर रुकी बस की खिड़की के नीचे फूल बेचती एक महिला।
“अच्छा, दे दे एक जोड़ी – सौ का छुट्टा तो है न?” अमित ने खिड़की से हाथ बाहर निकाल सौ का नोट दिखाते
हुए पूछा। अपनी नयी-नवेली मंगेतर सुचित्रा से शाम होने वाली मुलाकात की उत्सुकता उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।
“पीछे पान वाले से खुल्ले लेकर आती हूँ।” कह कर महिला ने नोट लिया और फूल अमित को पकड़ाए।
“अरे तब तक तो बत्ती हरी हो…” इससे पहले की अमित अपनी बात पूरी करता महिला आँखों से ओझल हो चुकी थी।

कुछ क्षणों में ही बत्ती हरी हो गयी और बस धीरे से आगे बढ़ने लगी। अमित ने पीछे दिखा तो फूल वाली भागती हुई आ रही थी। खिड़की के नीचे पहुँच कर उसने अमित को सौ रुपये वापस करते हुए कहा “बाबूजी खुल्ला नहीं मिला, अगली बार दे देना।” बस ने गति पकड़ी और अमित सोच में डूब गया कि अगली बार जाने कब इस ट्रैफिक सिग्नल से गुज़रना होगा और हुआ भी तो कैसे वह उस महिला को पहचानेगा।

“चलो पापा, ग्रीन लाइट हो गयी है – पीछे वाले हॉर्न बजा रहे हैं।” आर्यन और हॉर्न की आवाज़ें अमित को वर्तमान में ले आयी।
“हाँ बेटा, वो हिसाब लगा रहा था – इस हफ़्ते तो तेरे मैथ्स के पेपर में पूरे नंबर आये थे न, तो इस बार तुझे डबल पॉकेट-मनी मिलेगी।” अमित ने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए कहा।

© अजय मागो ‘हाज़िर’

बदतमीज़ ड्यूटी

फिक्स्ड डिपोसिट तुड़वाना था और बैंक बंद होने में केवल पंद्रह मिनट ही बचे थे। गाड़ी पार्किंग में लगा कर मैं तेज़ क़दमों से वहां पहुंचा तो उसी बदतमीज़ सिक्योरिटी गार्ड से फिर सामना हो गया। बैंक में दाखिल होने लगा तो रास्ता रोक कर खड़ा हो गया।
“ओ रै ताऊ, घनी जल्दी सै तन्ने – भीतर थारा ससुर बाट देख रया सै के?”
“वो, काम है – एफ डी तुड़वानी थी।” कड़वी-ज़ुबान पत्नी-समान जान कर मैंने उसके कटु-शब्दों को अपना पारा बढ़ाने न दिया।
“तेरा मास्क कित सिक सै?” उसने मेरे चेहरे की ओर इशारा किया।
जल्दबाज़ी में कोरोना-काल के सबसे महत्त्वपूर्ण उपसाधन (फेस-मास्क) को तो मैं गाड़ी में ही भूल आया था।
“नो
मास्क, नो एंट्री!” उसने अंग्रेजी में अपना फैसला सुनाया।
मैं जेब से रुमाल निकाल कर मुँह पर बांधने लगा तो मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे दरवाज़े से परे ले जाते हुए बोला “उरे ने आ, मन्ने तेरेते के केही? रुमाल कोणा चालेगा – नो मास्क, नो एंट्री! आगी बात समज्ज मा?”
बहस करना बेकार था। उसके पास खूंखार मूछें और जंग लगी राइफल थी। बैंक बंद होने में अभी भी कुछ मिनट बाकी थे, तो मैं गाड़ी की ओर लपका।

उसके पास खूंखार मूछें और जंग लगी राइफल थी!

गाड़ी से मास्क उठाया और आगे की सीट की तरफ रुमाल उछाला तो वो उड़कर सड़क पर जा गिरा। उसे उठा कर झाड़ते हुए याद आया कि यह वही रुमाल ही तो था…

बात आठ महीने पहले की थी जब हम पांच साल बैंगलोर रहने के बाद वापस फ़रीदाबाद शिफ्ट हुए थे। तब इसी रुमाल ने कवच बन कर यहाँ की धूल-मिट्टी से मेरी नाज़ुक नासिकाओं को बचाने का बीड़ा उठाया था। बचपन से ही मैं धूल-मिट्टी से एलर्जिक था। टॉन्सिल्स का ख़तरनाक अटैक, गला दर्द, ज़ुकाम, तेज़ बुखार, एरिथ्रोमायसिन का कोर्स और उसकी बदौलत पेट ख़राब। हर दो-तीन महीने बाद यही चक्र दोहराया जाता था। मगर बैंगलौर प्रवास के दौरान वहां के स्वच्छ वातावरण की बदौलत मैं एक बार भी बीमार नहीं पड़ा था, इसिलए फ़रीदाबाद वापसी पर थोड़ा डरा हुआ था। मगर इस रुमाल ने तब एक वफादार अंगरक्षक बनकर मेरा साथ दिया था। समय के साथ अब मेरी रोग प्रतिरोधक क्षमता ज़रूर बढ़ी है पर आठ महीने पहले तो जब भी घर से निकलना होता तो इसे मुँह पर बांध कर ही मैं गंगाधर से शक्तिमान बनता था। उस रोज़ भी बैंक किसी काम से आना हुआ था। तब भी इस बदतमीज़ सिक्योरिटी गार्ड ने चेहरे पर रुमाल देख कर नाटक किया था।
जो आज चेहरा ढ़कने की बात कर रहा है वही ज़ालिम सिंह तब मुँहदिखाई के लिए तड़प रहा था। चोर-डाकू पता नहीं क्या-क्या अनाप शनाप बोला था इसने मुझे और अंत में चेहरे से रुमाल उतरवा कर ही माना था।
ठन्डे दिमाग से सोचा तो लगा ठीक ही है। वह तब भी अपनी ड्यूटी कर रहा था और आज भी अपनी ड्यूटी कर रहा है। मगर ये ड्यूटी भी बड़ी अजीब चीज़ होती है। जब इंसान एक ड्यूटी करता है तो दूसरी भूल जाता है… या सामने वाले से इज़्ज़त से बात करने को हम अपनी ड्यूटी मानते ही नहीं ?

तभी पत्नी का SMS आया “कहाँ हो, इतनी देर कर दी! जल्दी आओ चाय का टाइम हो गया है!” घड़ी में देखा तो बैंक बंद होने में पांच मिनट बचे थे तो मैं झट गाडी में बैठकर घर की ओर निकल पड़ा – इस ड्यूटी में देरी मैं अफ़्फोर्ड नहीं कर सकता था।

© अजय मागो ‘हाज़िर’

मकान की कीमत (Short Story)

एक दशक पूर्व जब अपन शिकागो में अवतरित हुए थे तो इसकी बर्फीली सर्द हवाओं ने तो अपनी कुल्फी ही जमा दी थी। सांस्कृतिक झटका लगा सो अलग उस पर देश और अपनों से दूर होने का दर्द – हमें लगा नहीं था हम ज़्यादा दिन टिक पाएंगे यहाँ। पर अब यहाँ की सर्द हवाओं से टीकाकृत हुए इतना अरसा हो गया है कि अब ना जमती हमारी कुल्फी, अलबत्ता अब तो ये शिकागो नगरी ही हमको जम गयी! पेंशन वाली सरकारी नौकरी और अपना खुद का आलिशान मकान – इसके सिवा और जीने को क्या चाहिए।

This Story “मकान की कीमत (Price of House)” is available in audio book format for your listening pleasure. Click to Listen (Run Time: 5 Minutes) and provide your valuable feedback. For more such interesting short stories subscribe to our channel and press the bell icon!

हिंदुस्तान की ही तरह यहाँ अमरीका की सरकारी नौकरियों में भी पूरा समर्पण और कड़ी मेहनत लगती है। आप में खूब चाय-कॉफ़ी पीने और घंटों गप-शप करने यां इंटरनेट पर सर्फिंग करने की क्षमता होनी अनिवार्य है। चाय-कॉफ़ी से तो मम्मी ने बचपन से ही यह बोल के डराया हुआ था कि “मत पी बेटा, काला हो जायेगा” और गप-शप को हमने विवाद बनते इतना देखा था की इससे तौबा की हुई थी, तो अपने जॉब-प्रोफाइल का प्रमुख और अनकहा दायित्व इंटरनेट पर सर्फिंग करना ही था।

इसी दायित्व को निभाते हुए फेसबुक, शेयर मार्किट और क्रिकेट न्यूज़ के बाद हम ‘रेडफिन’ और ‘ज़िलो’ नामक वेब-साइट्स पर अपने मकान की कीमत को रोज़ बढ़ते देखकर ख़ुशी से मूछों पर ताव दिया करते थे। लेकिन पिछले तीन-चार महीने से देख रहे हैं कि हमारे मकान की कीमत गिरने लगी है जब कि शिकागो में औसतन तो घरों की कीमतें अभी भी बढ़ रही हैं। अपने रियल-एस्टेट के जानकार मित्र को फ़ोन लगाया तो पता चला कि हमारे मोहल्ले में एक ओल्ड-ऐज होम (वृद्धाश्रम) के खुलने की वजह से हमारे मोहल्ले के घरों के दाम में गिरावट आयी है। इसका कारण तो नहीं पूछा पर उन अमरीकी बच्चो को मन में खूब कोसा जो अपने माँ-बाप को बुढ़ापे में ओल्ड-ऐज होम में सड़ने के लिए छोड़ जाते हैं। ना वो ऐसा करते और ना ये ओल्ड-ऐज होम बनाना पड़ता और ना हमारे मकान की कीमत गिरती।

फिर एक शाम टहलते हुए उस ओल्ड-ऐज होम से गुज़रना हुआ तो बाहर “वालंटियर्स नीडेड” का बोर्ड देखकर मैं अंदर चला गया। रिसेप्शन पर बैठी मोहतरमा स्टेफनी ने बताया की स्टाफ की कमी की वजह से उन्हें वालंटियर्स की ज़रुरत थी। मैंने सप्ताहांत में अपनी उपलब्धता ज़ाहिर की तो स्टेफनी ने मुझे ईमारत का एक दौरा करवाया। पहले कमरे में मारिया नामक सत्तर वर्षीय महिला से मुलाकात हुई जिनका दाखिला दो महीने पहले हुआ था। देखने में स्वस्थ ही लग रहीं थी। मुस्कुरा कर उन्होंने मुझे प्यार से “हैल्लो डियर!” कह कर सम्भोधित किया। मैंने भी सादर “गुड इवनिंग” कह कर उन्हें अपने दांतों के दर्शन करवाए। उनके पास एक युवक कटोरी-चमच लिए खड़ा था और उन्हें अपने हाथों से खिला रहा था। उसने यूनिफार्म नहीं पहनी थी तो मैंने अंदाज़ा लगाया की वह भी मेरी तरह वालंटियर ही होगा। प्रेमपूर्वक उन्हें खिलाने के बाद जब वो जाने लगा तो मारिया ने उसे थैंक्यू बोला और उसका नाम भी पूछा। उसने अपना नाम सैम बताया और झुक कर मारिया से गले मिलकर विदा ली। मैंने सोचा भगवान की लीला ही है जो एक द्वार बंद होने पर दूसरा खोल ही देते हैं। मारिया के बच्चों ने उसे यहाँ छोड़ दिया तो क्या ग़म, यहाँ उन्हें इतने अनजान लोगो से इतना स्नेह तो मिल ही रहा है।

पूरी ईमारत का दौरा करने के बाद मैं स्टेफनी के साथ जब रिसेप्शन पर लौटा तो देखा सैम वहीँ एक सोफे पर बैठा मैगज़ीन पढ़ रहा था। मैंने उससे पूछा कि वो घर नहीं गया अब तक तो बोला कि उन्हें डिनर करवा कर रात को घर जायेगा। जाने से पहले मैंने स्टेफनी से पूछा कि सैम कितने घंटे वालंटियर करता है तो उसने बताया की सैम वालंटियर नहीं बल्कि विज़िटर है और मारिया उसकी माँ है जो Dementia की मरीज़ है। इस बीमारी के चलते उनकी यादाश्त आती-जाती रहती है – अक्सर अपने बच्चों के नाम तक भूल जाती हैं और यहाँ आने से पहले तो कई बार बीच रात में पैदल ही घर से दूर निकल लेती थीं। इसलिए उन्हें चौबीस घंटे देखभाल और निगरानी की ज़रुरत है। सैम और उसकी बहन क्रिस्टीना बारी-बारी से यहाँ रोज़ आते हैं। क्रिस्टीना मारिया को अपने हाथों से लंच कराती है और उनकी पसंदीदा नोवेल्स पढ़ के सुनाती और शाम को सैम आकर उनके साथ वक़्त बिताता है और उन्हें डिनर खिला कर ही वापस जाता है।

मेरे मकान की कीमत भले ही गिर गयी हो पर मेरी नज़रों में आज अपनी कर्म-भूमि (अमेरिका) के लोगों की कीमत ज़रूर बढ़ गयी है।

© अजेय मागो ‘हाज़िर’

मुसीबत में अमेरिका

मैंने उसे वॉलमार्ट में देखा। शॉपिंग चेक-आउट की लाइन में मुझसे आगे खड़ा, फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था। उस तरफ से दस डॉलर प्रति घंटे का ऑफर मिल रहा था और ख़ुशी से वह अपनी मंज़ूरी अभिव्यक्त करते हुए बतला रहा था कि उसे तो आठ डॉलर से भी कम मिलने की उम्मीद थी। अगली सुबह ५ बजे का समय तय हुआ। उसे साइट पर पहुंच कर वहां मौजूद लोगों के साथ मिलकर सारा कांच और मलबा उठाकर साइट को साफ़ और सुरक्षित करना था। पिछली रात वहां गुस्साई भीड़ ने खूब तोड़-फोड़ मचाई थी। लोग जॉर्ज फ्लॉयड नामक एक अश्वेत अमरीकी नागरिक की पुलिस के हाथों हुई मौत के विरुद्ध शांति प्रदर्शन के लिए एकत्रित हुए थे, मगर जाने ऐसा क्या हुआ कि बात आगज़नी, पथराव, तोड़-फोड़ और लूट-पाट तक पहुँच गयी थी।

जाने ऐसा क्या हुआ कि बात आगज़नी, पथराव, तोड़-फोड़ और लूट-पाट तक पहुँच गयी

नेक काम में मैंने भी हाथ बटाना चाहा और उसके फ़ोन रख्ते ही उससे स्थान का पता माँगा। उसने मुझे उस व्यक्ति का फ़ोन नंबर देना चाहा जो इस काम के दस डॉलर प्रति घंटा दे रहा था पर जब मैंने वालंटियर के तौर पर काम करने की इच्छा जताई तो उसने वहां का पता मुझे कागज़ पर लिख कर दे दिया। उसने अपना नाम जॉनेथन बताकर “सी यू टुमारो!” कहा और सोशल डिस्टन्सिंग का पालन करते हुए दूर से ही हाथ हिलाया।

अगली सुबह पांच बजे जब मैं साइट पर पहुंचा तो जॉनेथन समेत दर्जन भर लोग पहले से ही वहां मौजूद थे। शहरी महकमे के एक सज्जन ने सबको दस्ताने दिए और १० मिनट तक सफाई उपकरणों को इस्तेमाल करने और सुरक्षित विधि से मलबा हटाने सम्बन्धी जानकारी दी। फिर हमने काम चालु किया। कुछ मिनट बाद जॉनेथन मेरे पास आया और बताया कि कोरोना के चलते उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था इसलिए इस काम से जो पैसा मिलेगा वो उसके लिए महत्वपूर्ण है। उसने हंसकर ये भी पूछा कि क्यूंकि मैं इकलौता वालंटियर हूँ इसका मतलब मेरी नौकरी सही सलामत होगी! जब मैंने “हाँ” कहा तो उसने विनम्रतापूर्वक एक मदद मांगी – उसने मुझे उसी व्यक्ति को फ़ोन लगाने को कहा जिससे वह कल बात कर रहा था – मुझे बस यह कहना था कि मैं जॉनेथन का मित्र हूँ और आज यहाँ काम करना चाहता हूँ। ऐसा बोलने पर वह मुझे भी शाम को दस डॉलर प्रति घंटा देगा – जो बाद में जॉनेथन मुझसे ले लेगा। इस तरह जॉनेथन की आज की कमाई बीस डॉलर प्रति घंटा हो जायेगी। मुझे इसमें कोई हर्ज़ नहीं लगा, मैंने सोचा मुझे तो वैसे भी मदद करनी ही है – इस वालंटियर कार्य के साथ-साथ बेचारे जॉनेथन की भी मदद हो जाएगी। जग ज़ाहिर था की कोरोना ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी और एक-चौथाई अमेरिका बेरोज़गार हो चुका था।

फ़ोन करके मैं वापस काम पर लग गया। हँसते-खेलते सारा काम हो रहा था कि मैंने जॉनेथन को अपने एक साथी से हँसते हुए यह कहते सुना कि – यह सही रहा, पत्थर मारने और शीशे तोड़ने पर जितनी कमाई हुई थी, आज उससे दुगनी से भी ज़्यादा उन्ही शीशे के टुकड़ों को उठाने में हो रही है।

© अजेय मागो ‘हाज़िर’

सौतन (A Short Story)

“सौतन, मेरी जान की दुश्मन है तुम्हारी यह फेसबुक। कल से इसी से ही बोलना रोटी के लिए। यह दे सकती है क्या रोटी तुम्हे? जितना वक़्त इसके साथ बिताते हो अगर मेरे साथ बिताया होता तो आज जिंदगी खुशहाल होती। आखिर कौन सा ऐसा लड्डू मिलता है तुम्हे इससे जो मैं नहीं दे सकती? या तो इसे तलाक दे दो या मुझे, क्यूंकि एक मयान में दो तलवारें तो नहीं रह सकतीं। बगल वाले वर्मा को देखो और कुछ सीखो उससे। उसने तो फेसबुक पर अकाउंट तक नहीं बनाया, नतीजतन जो गाड़ी तुम्हारे सपने में भी नहीं आ सकती वो उसके घर के आगे रोज़ उसे दफ्तर ले जाने और घर छोड़ने आती है। याद करो वो कसमें जो खायीं थी तुमने जब मैं तुम्हे पांच साल पहले मिली थी। हज़ारों जान देने को तैयार थे मुझपे लेकिन फिर भी मैं सिर्फ तुम्हारी हुई। तब तुम अलग थे और अब कितना बदल गए हो।”

फिर कुछ क्षण के लिए मानसिक सन्नाटा। राहुल ने धीरे से अपनी ऑंखें खोली और यूँ लगा की उसकी आँखें सच में खुल गयीं हो। बात तो सही थी। क्या दिया है इस फेसबुक ने?

मम्मी का फ़ोन बजा – “राहुल, बेटा! अपना व्हाट्सप्प देख। कुछ लड़कियों की तसवीरें भेजी है। बता कोई अच्छी लगती है तो ?”

“मैंने कहा तो था आपसे मम्मी, आय ऍम मैरिड टू माय जॉब” राहुल ने वही जवाब दोहराया जो पिछले पांच साल से देता आ रहा था।

ये नौकरी कितनी मुश्किल से मिली थी। जब अनेको उमीदवारो में से सिर्फ राहुल का चयन हुआ था तो उसने कसम खायी थी की पूरी लगन से इस्पे ध्यान देगा और बदले में होगी उसके घर में रोटी, करियर में तरक्की और समाज में प्रतिष्ठा। फ़ोन रखते हुए उसी कसम को याद कर राहुल ने दिया फेसबुक को मन ही मन तलाक।

© अजेय मागो ‘हाज़िर’

या तो इसे तलाक दे दो या मुझे

ह्रदय परिवर्तन

शुरुआत झूठ से हुई थी। दीपिका ने माँ से झूठ कह रखा था कि उसने किसी को पसंद किया हुआ है। उस वक़्त इसके सिवा उसे कोई चारा नज़र नहीं आया था उनके “लड़का-देखने” के दबाव को टालने का।
वह अपने करियर पर ध्यान देना चाहती थी और शादी-ब्याह के चक्कर में पड़ने को तैयार नहीं थी। काल्पनिक लड़के का नाम माँ को संदीप बताया गया था। इस तरह साल भर तो गाड़ी चलती रही लेकिन तब पटरी से उतरने को हुई जब माँ ने फ़ोन करके अपना मुंबई आने का प्रोग्राम बताया। केवल एक हफ्ते का एडवांस नोटिस मिला था दीपिका को।

मरती क्या न करती, दुनिया भर के डेटिंग ऍप्स इनस्टॉल कर डाले फ़ोन पर और तलाश शुरू हुई एक अदद लड़के की। अच्छा कमाने वाला, केयरिंग, हैंडसम आदि गुणों से भी ज़्यादा महत्वपूर्व गुण था लड़के का नाम संदीप होना। खैर किस्मत ने उसका साथ दिया और आज वह इस रेस्टोरेंट में संदीप से तीसरी बार मिल रही है और इन चंद मुलाकातों में ही उसका ह्रदय परिवर्तन हो चुका है और माँ के पहुँचने से एक दिन पहले ही उसका झूठ सच में परिवर्तित होने के आसार दिखा रहा है।

अब वह मानसिक तौर पर तो विवाह के लिए तैयार है और हो भी क्यों ना – आखिर करियर में अब वह सेटल्ड है और हमारे संदीप में भी वो सभी गुण हैं जिन्हे वह तलाश रही थी। बस एक ख्याल जो थोड़ा दिमाग में संशय ला रहा है, वो है कि क्या संदीप ही सर्वोत्तम विकल्प है जीवनसाथी बनाने के लिए और क्या उनके बीच अच्छी केमिस्ट्री और ताल मेल बैठेगा। काश माँ ने थोड़ा और समय दिया होता धावा बोलने से पहले।

“इन दोनों में इतनी अच्छी केमिस्ट्री नहीं है!” पास की टेबल पर बैठे एक विवाहित और अपने से उम्र में बड़े जोड़े की तरफ इशारा करते हुए दीपिका ने कहा।
“क्यों, मुझे तो दोनों की जोड़ी ठीक ही लग रही है” संदीप की राय अलग थी।
“नहीं मेरा मतलब, अलग-अलग तो दोनों ठीक हैं, मगर आपस के ताल-मेल पर गौर करो ” दीपिका ने अपना नजरिया समझाया “दस मिनट से दोनों बैठे अपना-अपना खाना खा रहे हैं और आपस में कोई बात, कोई स्माइल, कुछ नहीं। क्या कुछ साल की शादी ऐसा कर देती है कि पति-पत्नी के पास कुछ बात ही नहीं रह जाती करने को ? मैं नहीं चाहती की हमारा रिश्ता आगे जाकर इन जैसा हो। “

संदीप कुछ क्षण उस जोड़े को देखता रहा। फिर बोला “इसे ही तो कहते हैं परफेक्ट केमिस्ट्री और ताल-मेल!”
“मतलब?” दीपिका चौंकी।
“दोनों आपस में इतने कम्फ़र्टेबल और सहज हैं कि कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता ही नहीं है – इससे बेहतर केमिस्ट्री क्या हो सकती है।” संदीप ने समझाया “अक्सर किसी रिश्ते की शुरुवात में हम दुसरे पक्ष को प्रभावित करने के लिए अधिक प्रयास करते हैं और इस चक्कर में अपने असली स्वभाव को कही छुपा कर, दबा कर रखते हैं लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे अपनापन और प्यार बढ़ता है, तो हमारी सहजता भी बढ़ती है और स्वभाव अपने आप आगे आने लगता है। ऐसा हो जाने पर ही रिश्ता सम्पूर्ण होता है।”

दीपिका का ह्रदय परिवर्तन भी सम्पूर्ण हो गया।

© अजेय मागो ‘हाज़िर’

दफ़्न

ज़िन्दगी में बेशुमार बने दोस्त अपने,
थे यारो की महफ़िल में चर्चे अपने।
पर यार-गद्दार दुनिया में इतने मिले,
के दफ़्न
कर दी अब दोस्ती हमने।

न तुझसे मुलाकात के बने सिलसिले,
दिल तरसता रहा तू कभी तो मिले।
आशिक़ पर इक नज़र जो तेरी पड़े,
दफ़्न
कर दूँ आज सारे शिकवे-गिले।

फ़िक्र-ओ-मुश्किल का है मारा जहाँ,
चैन ढूंढे भी गर तो मिलता है कहाँ।
हाथ आये बस रेत और सामने खाई,
दफ़्न
ग़म कर, मिट्टी डाल, गंगा नहा।

दफ़न ग़म कर, मिट्टी डाल, गंगा नहा

अजेय मागो ‘हाज़िर’

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