जीवन-जल (Life Water)

जीवन की कमीज़ के उपर वाले दो बटन खुले हुए थे। गले की टाई एक हारे हुए उम्मीदवार की तरह चेहरा लटकाये उसके कन्धे से झूल रही थी। मायूस कदमों से वो सेंट्रल पार्क में चहल-कदमी कर रहा था। सुबह जब वह उठा था तो बिसलेरी बॉटलिंग प्लांट का उच्चतम वेतन पाने वाला मैनेजर था, मगर शाम होते-होते मन्दी कि सूली चढ़ा एक और आंकड़ा बन के रह गया था। फ्लैट का किराया, गाड़ी की EMI, बच्चों के स्कूल की फ़ीसें, महीने के ख़र्चे, रिश्तेदारों के सवाल, सब मानो उसकी आँखों के सामने चिल्ला-चिल्ला कर तकाज़ा रहे हों।

सवाल जीवन के पास भी था ऊपर वाले से – आखिर कंपनी वालों ने उसे ही क्यों निकाला। अपनी जवानी के इतने बरस जिस कंपनी को दिए उस कंपनी ने एक बार भी नहीं सोचा। तथाकथित “सुरक्षित” नौकरी होने के कारन उसने कभी अपने तकनीकी कौशल में वृद्धि करना भी ज़रूरी नहीं समझा था। उसे कभी लगा ही नहीं था कि इस जीवन में उसे कोई और नौकरी ढूंढ़ने की नौबत आ सकती है। उसे तो यह भी याद नहीं था कि उसके पास अपने बायो-डाटा की कोई कॉपी भी सम्भली पड़ी थी याँ नहीं। कहाँ से मिलेगी अब दूसरी नौकरी। घर जाकर ज्योति से क्या कहेगा। उसने तो कई बार समझाया भी था कि प्राइवेट नौकरियों का कोई भरोसा नहीं कोई साइड-बिज़नेस शुरु करते हैं। लेकिन सब अच्छा चल रहा था तो उसकी बात पर कभी ग़ौर ही नहीं किया।
थकान और तनाव से सर चकराने लगा और गला सूखने लगा। खाली बेंच देख कर बैठ गया। बैग से नयी बिसलेरी की बोतल निकाली और एक ही सांस में आधी गटक गया और बचा हुआ पानी अपने सर पे उड़ेल दिया। कमीज़ के साथ स्वाभिमान भी पानी-पानी हो गया था। कुछ देर खाली बोतल को ताकता रहा फिर उसपे लगे बिसलेरी कंपनी के लेबल पर ध्यान जाने पर आग-बबूला हो उठा और गुस्से में बोतल से पास लगे कूड़ेदान पर बार-बार प्रहार करने लगा।

“साहब, साहब ये बोतल मैं ले लूँ?” छुटकी जोश में दौड़ती हुई आ रही थी। उसने मैली और अपने नाप से बड़ी फ्रॉक पहनी हुई थी जिसके दर्जन भर छोटे-बड़े छेद इस बात की गवाही दे रहे थे की वह फ्रॉक बेहतर दिन देख चुकी थी।
जीवन ने रुक कर ऊपर देखा और बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए पूछा “क्या करेगी इसका?”
“बेचूंगी साहब।”
“अच्छा बोरी खोल उसमे डालता हूँ”
“नहीं साहब हाथ में ही दे दो”
“क्यों?”
“पास वाले नल से पहले ५-६ बूँद पानी भरूंगी बोतल में, तब बोरी में डालूंगी”
“वो क्यों?”
“जब से मंदी हुई न साहब, कबाड़ वाले ने पिलाशटिक का भाव कम कर दिया, इसके वास्ते थोड़ा सा पानी डालना पड़ता है साहब ताकि कमाई में कमी न हो। कबाड़ वाले को पता भी नहीं चलता। किसी को बोलना नहीं, साहब।” छुटकी मुस्काते हुए अपनी व्यापार-रणनीति समझा कर वहां से रुखसत हुई।

बच्ची की बात सुन के जीवन के मुख पे प्रेरणा भरी मुस्कान आ गयी। उसने ठान लिया वो इस विपरीत परिस्तिथि में अवसर खोजेगा। उसके बैंक में छह माह का जीवनयापन खर्च मौजूद था। अब समय आ गया था कि ज्योति की सलाह पर अमल किया जाये। वह छोटे स्तर पे अपना खुद का पानी बॉटलिंग प्लांट शुरु कर सकता है। इतने साल इस उद्योग से जुड़े रहने की वजह से वो इसकी सारी बारीकियों को अच्छे से समझता था और अपने संपर्क-जाल के माध्यम से उसे शुरुवाती निवेश के लिए किसी बैंक से कर्ज़ा भी मिल जायेगा।

घर की ओर ड्राइव करते हुए उसने अपनी कंपनी का ब्रांड-नाम भी सोच लिया – “जीवन-जल”।

– अजेय मागो ‘हाज़िर’

Published by Ajay Mago 'Haazir'

Ajay Mago is an India-Born IT professional currently residing in Northern California. He writes poetry and short stories in his spare time. He writes in both Hindi and English languages and adopts a free-flowing writing style. Ajay attempts to weave a humorous spin as he pens down his thoughts and observations, predominantly about human relationships and the things/events that he witnesses in the contemporary world. He considers himself a true witness to the happenings in this movie scripted by God and so he assumes the pen name of “Haazir“ - Ajay Mago 'Haazir' (अजेय मागो ‘हाज़िर’) Connect with Ajay on Facebook Connect with Ajay on YouTube Read Ajay's Blog on WordPress Ajay's Books Published on Amazon

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