तबादला (The Transfer)

रोहित ने जब कागज़ का विमान अपनी छत से उड़ाया तो उसे क्या पता था कि चार रोज़ बाद उन्हें भी विमान में बैठ कर उड़ना होगा। डैडी के अचानक तबादले की खबर ने उसे हिला कर दिया था। नया शहर, नया स्कूल, नये दोस्त, कैसे एडजस्ट होगा वह मुंबई में।

जिस दिल्ली की गर्मी और प्रदूषण की दुहाईयाँ दिया करता था अब वही दिल्ली दिलबर दिखने लगी थी। चचा ज़ौक़ की इस राय से उसे इतना इत्तेफ़ाक़ पहले कभी न हुआ होगा कि “कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर”। डैडी से पूछा भी था कि किसी तरह ये तबादला रुक नहीं सकता – मगर डैडी-जी तो बड़े खुश थे, उन्हें तो मानो अमिताभ का जलसा, शाहरुख़ की मन्नत और चौपाटी की भेल-पूरी के सिवा कुछ दिखाई-सुनाई ही न दे रहा हो।

अब रोहित डैडी को क्या समझाता की अंतर्मुखी होने के कारन उसकी सबसे बड़ी चिंता नये सिरे से नये दोस्त बनाना थी। खैर जैसे तैसे मुंबई पहुंचे। कांदिवली ईस्ट की एक बहु-मंज़िला इमारत के आठवें माले पर उनका नया फ्लैट था। घर का सामान दो दिन बाद एक ट्रक से पहुंचा जो एक चौथाई तो मम्मी के गमलों से ही लदा हुआ था। इन फूल-पौधों को मानो पहले से ही आभास हो तबादले का, तभी तो दिल्ली की ज़मीन में जड़ पकड़ने की जगह गमलों में ही तैयार बैठे रहे इतने बरस।

“रोहित, बेटा गमले तुम ही एक-एक करके ऊपर ले आओ, ये लेबर पे ट्रस्ट नहीं कर सकते… गिरा के तोड़ ही न दें कहीं।” मम्मी अपने लाडलों के पहुँचने से अति प्रसन्न थीं। इन फूल-पौधों के प्रति मम्मी जी के प्रेम ने कभी रोहित को इकलौती संतान होने का एहसास ही नहीं होने दिया था।

तीन गमले एक साथ उठा कर रोहित लिफ्ट में घुसा। कोहनी से आठवें माले का बटन दबाने का प्रयास किया तो एक गमला नीचे गिरने लगा।
लिफ्ट में मौजूद रंजना ने हाथ बड़ा कर गमला संभाल लिया।
“कौनसा फ्लोर?” रंजना ने
मुस्कुराते हुए पूछा।
“थैंक्यू , 8th फ्लोर” रोहित ने चौंकते हुए कहा “मुझे लगा मैं लिफ्ट में अकेला ही हूँ”
“Can you even see anything, I mean आपकी आँखे तो इन पौधों ने ढकी हुई हैं” रंजना की हंसी छूट गयी।
“हाँ, सॉरी, थैंक्यू” रोहित थोड़ा सा embarrassed था… गर्दन हिला-हिला के पत्तों के बीच के फासले से उस मधुर आवाज़ के स्रोत को देखने की कोशिश कर रहा था।
“आठवें माले तक का सफर लम्बा है, थक जाओगे, पौधे नीचे रख लो” रंजना ने मुस्कुराते हुए सुझाव दिया।
“थैंक्यू” रोहित ने गमले लिफ्ट के फर्श पर रख दिए।
“सॉरी, थैंक्यू के सिवा भी कुछ बोलते हो क्या?”
“थैंक्यू”
“फिर से”
“थैंक्यू, मेरे छोटे भाई की जान बचाने के लिए!”
“क्या?”

“तुम्हे नहीं मालूम, मेरी मम्मी इन पौधों से कितना प्यार करतीं हैं – बिलकुल अपने बच्चों की तरह!”
“Oh I see” रंजना फिर मुस्कुरायी “By the way, माय नेम इज़ रंजना.. तुम अभी-अभी शिफ्ट हुए हो यहाँ?”
“हाँ, दो दिन हो गए, सामान आज आया है, नीचे ट्रक में है”
“अपना नाम बताओगे या ‘गुलाब-गेंदे का भाई’ कह के बुलाऊँ” रंजना ने चुटकी कसी।
“ओह सॉरी, माय नेम इज़ रोहित” आठवाँ माला आते-आते रोहित के चेहरे पर मुस्कान भी आ चुकी थी।

“मैं खाली हूँ अभी, अगर सामान ऊपर लाने में मदद चाहिए तो बोलो” रंजना ने पेशकश की।
“ठीक है, थोड़े से गमले और हैं – तुम साथ रही तो तीन-चार चक्कर में आ जायेंगे सारे” रंजना के मिलनसार स्वभाव से रोहित भी सहजता महसूस करने लगा था
“ठीक है तुम ये गमले रख कर आओ मैं लिफ्ट रोक कर रखती हूँ”

उस शाम, सारे गमले किचन की बालकनी में सजाने के बाद रोहित वहां से शहर का नज़ारा देख रहा था।
“आज एक हफ्ते बाद पहली बार तेरी शकल पे स्माइल देखी है” मम्मी पीछे से आकर पौधों को पानी देने लगीं।
“इतना बुरा भी नहीं है मुंबई” रोहित ने माना।
उसने कॉपी से
एक पन्ना फाड़कर विमान बनाया। बालकनी से नीचे उड़ाने ही वाला था कि सामने वाले फ्लैट की बालकनी पर उसे अपनी नयी मित्र नज़र आयी। हाथ के इशारे से विमान को अपनी ओर उड़ाने के लिए कह रही थी। जब विमान रंजना तक पहुंचा तो उसने पन्ने को खोलकर उसपर कुछ लिखकर वापस रोहित की ओर उड़ा दिया।

उसपर लिखा था “ऊपर, टेरेस से, और भी सुन्दर व्यू दिखता है, वहां से प्लेन उड़ाने में और भी मज़ा आएगा।”
रोहित ने अंगूठा दिखा कर हामी भरी और कुछ मिनट बाद ५ कागज़ के विमानों के साथ रंजना को छत पर मिला।
दोनों ने दो-दो विमान वहां से उड़ाए और अपने मोबाइल से उनकी वीडियो भी बनायी।
“सच में, बहुत सुन्दर नज़ारा दिखता है यहाँ से” रोहित ने कहा। बैकग्राउंड में किसी फ्लैट से राजेश खन्ना के गीत “ये शाम मस्तानी, मदहोश किये जाए” की रेडियो पे बजने की आवाज़ आ रही थी।
“मैंने कहा था न, मैं तो रोज़ शाम को आती हूँ फ्रेंड्स के साथ टेरेस पर, बहुत अच्छा लगता है”
“अच्छा है। कल भी आएंगे, मैं रात को ही और बहुत सारे प्लेन बना लूंगा”
“नहीं, कल कैसे!”
“क्यों?”
“कल तो हम दिल्ली शिफ्ट हो रहे हैं न, पापा का तबादला हो गया है”
रेडियो पे राजेश खन्ना का ही एक और गीत बज उठा – “ज़िन्दगी, कैसी है पहेली हाय, कभी तो
हसाये कभी ये रुलाये”। रोहित ने आखरी बचा हुआ विमान भी आकाश में उड़ा दिया।

– अजेय मागो ‘हाज़िर’

Published by Ajay Mago 'Haazir'

Ajay Mago is an India-Born IT professional currently residing in Northern California. He writes poetry and short stories in his spare time. He writes in both Hindi and English languages and adopts a free-flowing writing style. Ajay attempts to weave a humorous spin as he pens down his thoughts and observations, predominantly about human relationships and the things/events that he witnesses in the contemporary world. He considers himself a true witness to the happenings in this movie scripted by God and so he assumes the pen name of “Haazir“ - Ajay Mago 'Haazir' (अजेय मागो ‘हाज़िर’) Connect with Ajay on Facebook Connect with Ajay on YouTube Read Ajay's Blog on WordPress Ajay's Books Published on Amazon

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

Create your website with WordPress.com
Get started
%d bloggers like this: